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वह क्या बात है, जो एक सेलिब्रिटी को इतनी दोहरी तार्किक प्रतिरक्षा देने वाला उत्सुक तंत्र तैयार कर रही है? उफनाऊ पूंजी के स्मार्ट मैन्युअल में इसका उत्तर छिपा है।किसी भी मानवीय तंत्र में सुबूतों, सजाओं, सच्चाइयों का खेल नहीं, व्यक्तिगत नैतिकताओं का वास्तविक मोल आंकना काम्य होता है। किंतु, मनोरंजन के शातिर अर्थशास्त्र ने […]

वे लौट आए हैं। चिड़िया फिर चहचहाईं। पर्चे फिर फटने को तैयार हुए। बांहें फिर चढ़ने को अकुलाईं। आशा उठी, अधीरता के कंधे पर बैठकर उत्साह के कान में गीत गाने लगीं। मंच बना, हवा चली, चेहरे खिले, फिर तेरी कहानी याद आई। किसान दुखी थे। खेती करते-करते दुख कलावती से उठकर लीलावती हुआ जा […]

तुलना करना साहस का काम है। प्रेम में अपना सबसे सुंदर, विलक्षण और अद्वितीय ही लगता है। वह अद्वितीय तो खैर होता ही है क्योंकि एक जैसा एक ही मिलेगा। पर सुंदरता और प्रतिभा का पैमाना प्रेम के हिसाब से तय हो तो जीवन दार्शनिक हो जाता है। इसी दर्शनशास्त्र के सहारे पिछले दिनों अमित […]

हंसने वाले कौन लोग हैं? लंबे-लंबे हाथ करके और गर्दन घुमाकर ज्ञान देने वाले कौन लोग हैं? मंद-मंद मुस्काते और ‘स्टिंग के बारे में स्टिंग वालों को ही मार’ का उद्घोष करने वाले कौन लोग हैं? वे कौन हैं, जो विकल्प के व्याख्यान की मीमांसा में वाचिक परंपरा का लावा उगल रहे हैं? ऊपर से […]

नीलामी, निर्मलता और सरकार का संबंध इतना गहरा है कि एक के बिना दूसरी घटना संभव नहीं होती। अगर सरकार न बने, तो नीलामी कौड़ियों में जाती है और निर्मलता धरी रह जाती है। अगर सरकार बने, तो निर्मलता सूट में समा जाती है। कवि बहुत दिनों के बाद रौ में आया। उसके दीये में […]

मूर्ति की आंख के आंसू, बाग की उम्मीद में हैं। उन्हें शीशियों में भरकर व्यापार करना वैसा ही होगा जैसे चांद पर बैठी काल्पनिक बुढ़िया के चरखे की फ्रेंचाइजी बेच देना। अरविंद की शक्ल में एक उम्मीद है। और, उम्मीद की फ्रेंचाइजी नहीं बिकती।   मूर्ति जब रोई तो उसकी एक आंख से टपकी बूंद […]

कांग्रेसी विमर्शवीरों के लिए सब हरा-हरा है। उन्हें तो बस मजे लेते हुए मौजूदा सरकार के असफल होने की प्रतीक्षा करनी है। जैसे ही इसका करिश्मा टूटने लगेगा उनके सिवाय देश को कौन मिलेगा? तब तक कारपोरेट, पूंजी, सांप्रदायिकता आदि का बौद्धिक काढ़ा पिलाते रहिए।   किसी-किसी को आपके किए से तकलीफ होती है। मौका पाकर […]

राजनीति में अंगुलियां डुबोकर उसकी चाशनी को मक्खियों से बचाना अलग कला की मांग करता है। यह कला बिरलों से ही सधती है। लीला सैमसन ने सेंसर बोर्ड से इस्तीफा दे दिया है। उनके समर्थन में भी इस्तीफे आ गए हैं। हल्ला है कि बात सिद्धांत की है। लीला का कहना है कि हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार […]

करोड़ों का दांव खेल रही लोकप्रिय फिल्मों का कारोबार मार्क्सवाद, लोहियावाद या हिंदूवाद की सेवा में नहीं चलता।यह इंडस्ट्री जोखिमों को कारोबारी चालाकियों से निरस्त करती है। और वक्त जरूरत उन चालाकियों को साहस कहती है। काफी देर से यूपी और बिहार की नींद खुली है। उन्हें पता लगा है कि करोड़ों क्लब में शामिल […]

मित्रो, पिछले दिनों एक किताब की भूमिका लिखने का आग्रह मिला। मुझे यह कथा याद आई। मैं आपको फिर सुनाता हूं। मैंने भी सुनी थी। मोईशे नाम का एक बढ़ई हफ्ते भर की मजदूरी लेकर लौट रहा था कि सुनसान गली में हथियारबंद लुटेरे के हत्थे चढ़ गया। ‘मेरे सारे पैसे ले लो’, मोईशे ने […]